जिसे अरबी नही आती वो कुरान क्यूं पढता है?क्या बिना समझे कुरान पढने का भी कोई फायदा है?

, लेखक @ किरात

जवाब 6 महीने पहले लिखा गया • आपको इस में दिलचस्पी हो सकती है

एक पहाड़ी इलाक़े में एक बुज़ुर्ग अपने नौजवान पोते के साथ रहते थे- वो हर रोज़ सुबह सवेरे क़ुरआन की तिलावत किया करते- पोता भी हमेशा उन जैसा बनने की कोशिश करता- एक दिन पोता कहने लगा: दादा जान ! मैं भी आपकी तरह क़ुरआन ए पाक पढ़ने की कोशिश करता हूं, लेकिन मुझे समझ नहीं आती- और जो समझ आए, जैसे ही क़ुरआन बंद करूं,भूल जाता हूं- ऐसे में क़ुरआन पढ़ने से हम क्या सीखते हैं?
दादा जी ने खामोशी से कोयलों वाली टोकरी में से कोयले निकाल कर अंगीठी में डाले- फिर टोकरी पोते को देकर कहा:
जा पहाड़ के नीचे बहती नदी से मुझे पानी की टोकरी भर कर ला दे,
लड़के ने दादाजी की बात पर अमल किया- लेकिन वापस पहुंचने तक सारा पानी टोकरी के सूराखों में से बह गया-
दादाजी मुस्कुराए और कहा:
तुम इस दफा और ज़्यादा तेज़ क़दम उठाना,ये कहकर पोते को वापस भेज दिया-
लेकिन इस बार वो बाल्टी में पानी ले आया-
दादाजी ने कहा:
मुझे बाल्टी नहीं टोकरी में पानी चाहिए- तुम ठीक से कोशिश नहीं कर रहे- उसे फिर नीचे भेज कर वो दरवाज़े में खड़े देखने लगे कि पोता कितनी सई करता है- लड़के को इल्म था कि सूराखों भरी टोकरी में पानी भरना नामुमकिन है- बहरहाल दादाजी को दिखाने के लिए टोकरी पानी से भरी और इंतिहाई तेज़ी से वापस दौड़ पड़ा- लेकिन पहुंचने तक टोकरी में से फिर पानी बह चुका था और वो खाली थी-
लड़के ने कहा:
देखा दादा जान ! इसमें पानी भरना बेसूद है-
दादाजी कहने लगे:
बेटा ! टोकरी की तरफ देखो,
अब नौजवान को पहली बार एहसास हुआ कि टोकरी पहले से बहुत मुख्तलिफ लग रही है- वो पुरानी और गंदी टोकरी अंदर बाहर से साफ सुथरी हो चुकी थी-
दादाजी ने कहा:
बेटा ! ज़रा देखो,कोयलों से सियाह हुई टोकरी बार बार पानी के धोने से साफ हो गई- इसी तरह जब हम तिलावते क़ुरआन करें,तो चाहे उसका एक लफ्ज़ भी ना समझ पाएं,तिलावत हमें अंदर और बाहर से ऐसे ही पाक साफ कर देती है- यूं अल्लाह तआला हमारी ज़िन्दगी बदल देता है-

क़ुरआन पढ़ा करें

हम भी सब वो टोकरियां हैं जिसमें सूराख हैं

अरबी हम में किस को आती है?

100 में से शायद 30% लोगों को अरबी आती है,बा तर्जुमा समझ लेते हैं, कोशिश करें क़ुरआन पढ़ा करें

ऐसा करना ज़ाया और बेकार नहीं जाएगा..!!

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