भारत की किस चीज़ का दुनिया लोहा मानती है ?

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"हम अपनी दवा बेचारे ग़रीब हिन्दुस्तानियों के लिए नहीं बनाते. हमारी दवा उन पश्चिमी अमीर लोगों के लिए है जो इसे खरीद सकने का दम रखते हैं"

ये शब्द हैं मार्जिन देक्केर्स के जो दवा बनाने वाली कंपनी  Bayers AG के मालिक हैं

इन शब्दों को आम विदेश्यों के शब्द मत समझिएगा जो अक्सर अपने घमंड में भारतियों के बारे में कुछ कुछ बकते रहते हैं

ये शब्द हैं एक बुरी तरह से घायल और किनाराकश खरबपति के जो कैंसर के इलाज की दवा Nexaver से भारत में मुनाफा भुनाना चाह रहे थे

ये बात है २०१२ की जब नाटको फारमा नाम की कंपनी को भारत के पेटेंट कंट्रोलर ने नेक्सावर दवा को बनाने का कम्पलसरी लाइसेंस दे दिया था. इस एक साल की दवा के कोर्स की कीमत पड़ती थी करीब 68 लाख रुपय! जब की यही दवा अगर भारत में बने तो इसकी एक साल की कीमत बनती है 1 लाख 20 हजार

भारतीय कंपनी को 7% रॉयल्टी Bayers AG को देनी पड़ती थी

"कम्पलसरी लाइसेंस एक ऐसा प्रावधान है जिसके अंतर्गत कोई सरकार किसी कंपनी को कोई नए अविष्कार को अविष्कारक कंपनी की इच्छा के बिना ही बेचने की इजाज़त दे सकती है"

Bayers AG ने फ़ौरन इस प्रावधान के खिलाफ पेटेंट कंट्रोलर के पास अपील की परन्तु इनकी अपील ये कह कर  ख़ारिज कर दी की इससे जनता के हितों को नुक्सान पहुंचेगा

इसके बाद Bayers AG कंपनी  सुप्रीम कोर्ट गयी जहाँ मामला बड़ी तेज़ी और मज़ेदार तरीके से चला

सुप्रीम कोर्ट में Bayers AG ने कहा की इस तरह से लाइसेंस देने से न सिर्फ हमारा नुकसान होगा बल्कि बड़ी कंपनियां किसी दवा की खोज करने में पैसा लगाने में भी हिचकिचाएंगी और दवा की रिसर्च पर पैसा कोई नहीं लगाएगा

कुछ लोगों ने ये भी कहा की उनकी बात सही थी क्यों की अगर दवा की खोज में लगाया हुआ पैसा और समय का ठीक से कंपनी को फायदा न हो तो वो अच्छी, नयी और बेहतर दवाइयों की रिसर्च क्यों करेंगी ?

लेकिन ये बात मज़बूत नहीं थी Bayers AG ने इस दवा को 2005 में खोजा था और उन्हें इसे भुनाने के लिए 8 साल का समय मिल चुका था और इसकी खोज पर लगे पैसे उन्होंने 2006 में ही महंगी दवा बेच कर निकाल लिया था

सुप्रीम कोर्ट ने Bayers AG की अपील 2014 में ख़ारिज कर दी और नाटको फार्मा दवा बनाती रही

इस क़दम की न सिर्फ देश भर के एक्टिविस्ट लोगों ने सराहना की बल्कि इसको चर्चा विदेशों में भी हुयी

ऐसा ही केस 2012 में हुआ था जब novartis ने अपनी एक दवा Glivec को "एवरग्रीनिंग" करने को कोशिश की थी

जब बड़ी कंपनी किसी पुरानी दवा में छोटे मोटे बदलाव  से नयी खोज बता कर पेटेंट कर ले तो इसे एवरग्रीनिंग कहते हैं . जब किसी दवा कंपनी का कोई पेटेंट एक्सपायर होने वाला होता है तो वो अपने पेटेंट को बचाए रखने के लिए ऐसा करती हैं,  लकिन सुप्रीम कोर्ट ने इनके पेटेंट को भी ख़ारिज कर दिया ... ये एक और जीत थी

Glivec दवा का महीने भर का खर्च है 1 लाख 82000 जब की ये भारत में 12000 के अस पास में बिकती है

हमें गर्व होना चाहिए की भारत अकेला बड़ी कम्पनयों की साज़िशों से लड़ रहा है और यही कारण है के भारत को दुनिया की फार्मेसी भी कहा जाता है

यहाँ की बनी दवाएं न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी बेचीं जाती है जहाँ ग़रीब लोग कम कीमतों पर दवाएं खरीद पाते हैं ..

और हाँ हमारे यहाँ की कंपनियां न केवल जेनेरिक दवाएं यहाँ बेचती हैं बल्कि अमेरिका जैसे देशों में भी एक्सपोर्ट करते हैं, वहां भी लाखों ऐसे लोग हैं जिनके पास हेल्थ इन्शुरन्स नहीं है और वो डॉक्टरों की फीस भी नहीं दे सकते . यही कारण है की सारी दुनिया का मीडिया भारत के इस कदम की आलोचना करने के बजाये तारीफ कर रहा है

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