मुगल सराय स्टेशन और दिन दयाल उपाध्याय के बीच क्या सम्बंध है? स्टेशन का नाम क्यों बदला जा रहा है

, लेखक @ किरात

जवाब 10 महीने पहले लिखा गया • आपको इस में दिलचस्पी हो सकती है

*यह सन् 1968 की बात है*

मुग़लसराय स्टेशन के यार्ड में लाइन से करीब 150 गज दूर एक बिजली के खंबे संख्या 1267 से करीब तीन फुट की दूरी पर एक लाश पड़ी मिली।

 इस लाश को सबसे पहले रात करीब 3.30 बजे लीवर मैन ईश्वर दयाल ने देखा था। उसने सहायक स्टेशन मास्टर को इसकी सूचना दी।

 करीब पांच मिनट बाद सहायक स्टेशन मास्टर मौके पर पहुंचे। उनके कार्यवाही के रजिस्टर में पटरी के पास पड़े इस आदमी के बारे में दर्ज किया गया, “ऑल मोस्ट डेड”.

 यह लाश "भारतीय जनसंघ" के पहले अध्यक्ष पंडित दीन दयाल उपाध्याय की थी।

 संसद के बजट सत्र शुरू होने के मद्देनज़र जनसंघ ने 11 फरवरी 1968 को अपने 35 सदस्यों वाले संसदीय दल की दिल्ली में बैठक बुलाई थी।

 एक दिन पहले जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय लखनऊ में थे परन्तु वह दिल्ली जाने के बजाय जाने किस अज्ञात कारण के दिल्ली-हावड़ा एक्सप्रेस से हाबड़ा की तरफ निकल पड़े।

 सीबीआई जाँच में दो आरोपियों के इकबालिया बयान कोर्ट में पेश किए गये। इन बयानों में उन्होंने स्वीकार किया था कि उन्होंने चोरी का विरोध कर रहे दीनदयाल उपाध्याय को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया था।

 लेकिन उपाध्याय के सामने की सीट के सहयात्री एमपी सिंह के बयान में इस प्रकार की किसी भी घटना का जिक्र नहीं था।

 कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि दोनों पक्ष कोई ऐसा साक्ष्य या बयान पेश नहीं कर पाए, जिससे इस मामले में किसी न्यायपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके. साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया।

 पंडित दीन दयाल उपाध्याय के बाद अटल बिहारी बाजपेयी जनसंघ के अध्यक्ष बने और फिर लाल कृष्ण आडवाणी।

 बलराज मधोक तब इन दोनों के प्रतिद्विन्दीशथे और जनसंघ पर आरएसएस के बढ़ते प्रभाव को लेकर उन्होंने नाराजगी जताई।

 अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने बलराज मधोक को अनुशासन तोड़ने के आरोप में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

 जिस पार्टी "जनसंघ" का संविधान खुद मधोक ने लिखा था, वो पार्टी से बाहर निकलते ही बगावत पर उतर आए उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय की मौत को राजनीतिक हत्या बताया। उन्होंने इस कत्ल के लिए नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी को जिम्मेदार ठहराया।

 

 *आज अधिकारिक रूप से समाप्त हो गये मुगलसराय*

 

और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का बस इतना सा संबन्ध है और इतनी सी कहानी है।

 मुग़लसराय स्टेशन का नाम मुगलों के नाम पर ना होता तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय की लाश के साथ "मुगल" शब्द नहीं जुड़ता।

 *सुन रहे हैं कि मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने में करीब ₹100 करोड़ खर्च होंगे या हो गये।*

 खैर , योगी और मोदी के इस कदम से ट्रेनों का संचालन समय से हो जाएगा जो दीन दयाल की आत्मा के विरोध के कारण नहीं हो पा रहा था। ट्रेनें साफ सुथरी और सुविधाजनक हो जाएँगी और यात्रियों को ट्रेन के एक मिनट पूर्व मनचाहे स्थान के लिए हर ट्रेन में सीट मिल जाएगी।

 

सबको बधाई

 

मुसलमानों का इस देश में हुकूमत 650 साल माना जाता है , किसी की पहचान मिटाने की सनक उनकी होती तो ना तो अयोध्या होती ना वहाँ के हजारों ऐतिहासिक मंदिर ना खजुराहो ना अजंता एलोरा।

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