सारी दुनिया में ज़ालिम और अत्याचारी लोगों को सरकारें बन रही हैं, ऐसा क्यों?

, सॉफ्टवेर इंजिनियर

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“ज़ालिमों की हुक़ूमत, इस बात का इशारा है की हक़ ग़ालिब होने वाला है, बातिल का नामों निशां मिटने वाला है। इस दुनिया में सिर्फ और सिर्फ शांति रहेगी। इंशा अल्लाह।”

अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया:

मेरा ज़माना रहेगा, जब तक अल्लाह चाहेगा।
उसके बाद खिलाफत-ए-राशिदा होगी, जब तक अल्लाह पसंद फरमाएगा।
उसके बाद मुलूकियत होगी, जब तक अल्लाह चाहेगा।
उसके बाद जब्र वाली (कुछ रिवायत के मुताबिक काट खाने वाली) आमरियत होगी, जब तक अल्लाह चाहेगा।
उसके बाद खिलाफत अला मिनहाजुल नबुवत (नबुवत की तर्ज़ पर खिलाफत) होगी।

जिस दौर में हम जी रहे हैं ये इंसानियत की तारीख में सबसे बदतरीन दौर है। ऐसा नहीं है कि अब से पहले लोग क़त्ल नहीं होते थे। लेकिन तब बातिल (बुराई) पर ‘आज़ादी’ खुशफहमी लबादा नहीं पड़ा था। ये मौजूदा नेशनलिज़्म की बुनियाद पर क़ायम होने वाला मग़रिबी जम्हूरी निज़ाम बेशक वही ‘काट खाने वाली आमरियत’ है, जिसका ज़िक्र आप (सल्ल०) ने फ़रमाया था।

तूने क्या देखा नहीं, मग़रिब का जम्हूरी निज़ाम
चेहरा रौशन, अंदरूँ चँगेज़ से तारीक तर
– अल्लामा इक़बाल

अमेरिका में ट्रम्प, रूस में पुतिन, इज़राइल में नेतन्याहू, भारत में मोदी, मिस्र में अल सीसी, बांग्लादेश में हसीना और सीरिया में बशर। जिस तेज़ी के साथ दुनिया के तमाम अहम मुमालिक पर ज़ालिम लोग चुन कर काबिज़ हो रहे हैं, इससे हमें ये जाल लेना चाहिए कि अब ये खेल अपनी इन्तेहा को पहुँचने वाला है।

अल्लाह इस ‘काट खाने वाली आमरियत’ की वो आख़िरी और सबसे खूंखार शक्ल दुनिया को दिखा देना चाहता है। ये रात की तारीकी का वो दौर है जब अँधेरा अपनी पूरी ताक़त के साथ दुनिया पर ग़ालिब हो जाना चाहता है।

लेकिन जान लो, अल्लाह अपना फैसला लिख चुका और कौन है जो उसके फैसले को चैलेंज कर सके?

“अल्लाह अपने नूर का इतमाम करके रहेगा, ख्वाह ये बात काफिरों को कितनी ही नागवार क्यों ना गुज़रे।” – क़ुरआन

नोट :- लेकिन ऐ उम्मत-ए-मुस्लिमा, ये इंक़लाब सिर्फ और सिर्फ आपकी कोशिशों के नतीजे में आना है। वक़्त के बिगुल की आवाज़ सुनो, और पूरा करो अपनी उस ज़िम्मेदारी को, जिसके लिए तुम्हे बरपा किया गया है। ‘अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह के क़लमे को बुलंद करने और उसकी दीन को कायम करने की जद्दो-जहद करना’ हमारे मसाइल का वाहिद इलाज है।

सियाह रात नहीं लेती नाम थमने का
यही है वक़्त, सूरज तेरे निकलने का ।।

अब्दुल क़ादिर

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